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🌼 नंदा महोत्सव 🌼

॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥

🚩 नंदा महोत्सव Nand Mahotsav 2025 🚩

नंद महोत्सव के बारे में(About Nand Mahotsav):

                 भारत के तीन राज्यों उत्तर प्रदेश(Uttar Pradesh), गुजरात( Gujarat) और महाराष्ट्र(Maharashtra) में गोकुलाष्टमी मनाने का विशिष्ट महत्व है क्योंकि इन स्थानों पर भगवान ने विशेष लीलाएं की हैं। उत्तर प्रदेश की पावन धरती पर श्री कृष्ण जी(Shri Krishna ji) ने जन्म लिया, मन मोह लेने वाली अठखेलियां करते हुए बचपन बीता माखन चुराना, दूध, दही से भरी मटकियां फोड़ना, राधा जी से प्रेम आदि। गुजरात की पावन धरती ठखेलियों की और महाराष्ट्र में तो श्रीकृष्ण जी के बालहठ और शरारतों से जुड़े खेल होते हैं जो दुनियाभर में मशहूर हैं। दही हांडी(Dahi Handi) प्रतियोगिता के लिए तो प्रतियोगी पूरे साल मेहनत करते हैं।  

  
                 संसार भर में जन्माष्टमी(Janmashtami) पर्व को धूम-धाम से मनाया जाता है। इस त्यौहार को अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे कृष्णाष्टमी(Krishnashtami), सातम आठम(Satam Aatham), गोकुलाष्टमी(Gokulashtami), अष्टमी रोहिणी(Ashtami Rohini), श्रीकृष्ण जयंति(Shri Krishna Jayanti) और कृष्ण जन्माष्टमी आदि। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भाद्र महीने की अमावस्या की अष्टमी यानी आठवें दिन कृष्ण अष्टमी मनाने का विधान है।  

  
                 ब्रजमंडल क्षेत्र के गोकुल और नंदगांव में श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के दूसरे दिन नंदोत्सव या नंद उत्सव का विशेष आयोजन होता है। शास्त्रों के अनुसार कंस की नगरी मथुरा में अर्धरात्रि में श्रीकृष्ण के जन्म के बाद सभी सैनिकों को नींद आ जाती है और वासुदेव की बेड़ियां खुल जाती हैं। तब वासुदेव कृष्णलला को गोकुल में नंदराय के यहां छोड़ आते हैं। नंदराय जी के घर लाला का जन्म हुआ है धीरे-धीरे यह बात गोकुल में फैल जाती है। अतः श्रीकृष्ण जन्म के दूसरे दिन गोकुल में ‘नंदोत्सव(Nandotsav)’ पर्व मनाया जाता है। भाद्रपद मास की नवमी पर समस्त ब्रजमंडल में नंदोत्सव की धूम रहती है। 

  
                 श्री कृष्ण का जन्म मात्र एक पूजा-अर्चना का विषय नहीं है बल्कि एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस उत्सव में भगवान के श्री विग्रह पर कपूर(camphor), हल्दी(turmeric), दही(curd), घी(ghee), तेल(oil), केसर(saffron) तथा जल आदि चढ़ाने के बाद लोग बडे़ हर्षोल्लास के साथ इन वस्तुओं का परस्पर  सेवन करते हैं। पूरे उत्तर भारत में इस त्‍यौहार के उत्‍सव के दौरान भजन गाए जाते हैं व नृत्‍य किया जाता है। 

  
दधिकांदो पर्व(Dadhikando Festival): नंदोत्सव पर्व दधिकांदों के रूप में भी मनाया जाता है। दधिकांदो का अर्थ है दधि और कंध का मिश्रण। अर्थात केसर या हल्दी मिश्रित दही से कृष्ण जन्म पर होली मनाई जाती है। इस दिन पूरे उत्तर भारत में दिन के समय में केसर या हल्दी मिश्रित दही से होली खेली जाती है तथा शाम के समय मंदिरों में ग्रहस्थ पुजारी बाबा नंद और मैया यशोदा के भेस धारण कर कृष्ण-लला(Krishna-Lala) को पालने को झुलाते हैं। प्रसाद रूप में मिठाई, फल, मेवा व मिश्री लुटायी जाती है। श्रद्धालु इस प्रसाद को पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं। 

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🕰️ Kajari Teej 2025 Date & Time:📅

भगवान श्रीकृष्ण का 5252वाँ जन्मोत्सव 

कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, अगस्त 15, 2025 को 

निशिता पूजा का समय – 00:21 से 01:05, अगस्त 16 

अवधि – 00 घण्टे 45 मिनट्स 

दही हाण्डी शनिवार, अगस्त 16, 2025 को 

धर्म शास्त्र के अनुसार पारण समय 

पारण समय – 21:34, अगस्त 16 के बाद 

पारण के दिन अष्टमी तिथि का समाप्ति समय – 21:34 

रोहिणी नक्षत्र के बिना जन्माष्टमी 

धर्म शास्त्र के अनुसार वैकल्पिक पारण समय 

पारण समय – 06:18, अगस्त 16 के बाद 

देव पूजा, विसर्जन आदि के बाद अगले दिन सूर्योदय पर पारण किया जा सकता है। 

वर्तमान में समाज में प्रचलित पारण समय 

पारण समय – 01:05, अगस्त 16 के बाद 

भारत में कई स्थानों पर, पारण निशिता यानी हिन्दु मध्यरात्रि के बाद किया जाता है। 

मध्यरात्रि का क्षण – 00:43, अगस्त 16 

चन्द्रोदय समय – 23:19 Krishna Dashami 

अष्टमी तिथि प्रारम्भ – अगस्त 15, 2025 को 23:49 बजे 

अष्टमी तिथि समाप्त – अगस्त 16, 2025 को 21:34 बजे 

रोहिणी नक्षत्र प्रारम्भ – अगस्त 17, 2025 को 04:38 बजे 

रोहिणी नक्षत्र समाप्त – अगस्त 18, 2025 को 03:17 बजे 

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💐जन्माष्टमी   ूजा िधि(Janmashtami Puja method) 💐

  • आज प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर जन्माष्टमी व्रत रखकर भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने का संकल्प लें। 

  • प्रातःकाल ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, ॐ कृष्णाय वासुदेवाय गोविंदाय नमो नमः का जाप करते हुए चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर कलश की स्थापना करें। 

  • पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। पूजा की थाली में चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी के पत्ते, रक्षासूत्र, मौसमी फल, मक्खन, मिश्री, खोया प्रसाद आदि रखें। 
     
  • चौकी के दाहिनी ओर घी का दीपक जलाएं। तत्पश्चात देवकी माता और वासुदेवजी की पूजा करें। नंद बाबा और यशोदा मैया की भी पूजा करें। चंद्रदेव की भी पूजा करें।  

  • रात्रि 8 बजे खीरा काटकर उसमें बाल गोपाल की मूर्ति रखें। इसका अर्थ है कि भगवान कृष्ण माता देवकी के गर्भ में हैं।  

  • शुभ मुहूर्त में खीरे से लड्डू गोपाल को बाहर निकालें। फिर शंख में पंचामृत भरकर लड्डू गोपाल का अभिषेक करें। उन्हें वस्त्र, आभूषण आदि से सुशोभित करें। अक्षत, चंदन, धूप, दीप, गंध, पुष्प आदि से पूजन करें।

  • भगवान श्री कृष्ण का जन्म रात्रि 12 बजे हुआ था, इसलिए आपको उसी समय लड्डू गोपाल की पूजा करनी चाहिए। उन्हें भोग लगाएं। 11 दीपक जलाएं। फिर भगवान कृष्ण से अपने दुख दूर करने की प्रार्थना करें। बाल गोपाल के जन्मोत्सव पर प्रसाद बांटें।

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🍀पूजा सामग्री(The worship material):🍀

भगवान कृष्ण की पूजा सामग्री में खीरा, बाजोट, पीले स्वच्छ वस्त्र, शिशु कृष्ण की मूर्ति, सिंहासन, पंचामृत, गंगाजल, दीपक, दही, शहद, दूध, घी, धूपबत्ती, गोकुलाष्ट, चंदन, अक्षत और तुलसी के पत्ते, मक्खन, मिश्री भोग सामग्री शामिल है 

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🌻नंदा महोत्सव(Nanda Mahotsav):🌻 
     
                       

                    गोकुल में जन्माष्टमी से भी ज्यादा महत्व नंद उत्सव(Nanda festival) का है। यह उत्सव जन्माष्टमी के अगले दिन यानी श्रावण सुद नोम को नंदराय(Nandaray) और यशोदाजी(Yashodaji) के घर मनाया जाता है। गोकुलवासी चॉकलेट, खिलौने और करेंसी सिक्के फेंककर कृष्ण जन्मोत्सव की खुशियां मनाते हैं। उसके बाद गोकुल के चौक-चौकरी में मटकीफोड़(Matkifod) कार्यक्रम रंगारंग तरीके से मनाया जाता है। 

  
             जन्माष्टमी का त्योहार वैसे तो पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन कृष्ण के जीवन से जुड़े पवित्र तीर्थस्थलों पर कृष्णजन्म उत्सव में शामिल होना जीवन में एक अनमोल सौगात है। 

  
गोकुल(Gokul): गोकुल कृष्ण की बाल भूमि है। गोकुल में जन्माष्टमी से भी ज्यादा महत्व नंद उत्सव का है। यह उत्सव जन्माष्टमी(Janmashtami ) के अगले दिन यानी श्रावण सुद नोम को नंदराय और यशोदाजी के घर मनाया जाता है। जो कृष्ण के पालक माता-पिता हैं। 

  
                जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण का श्रृंगार किया जाता है। व्रज के एक पुत्र को नंदराय के परिधान पहनाए जाते हैं और वह पुत्र यशोदामैया बन जाता है। तब व्रजवासी खुशी-खुशी एक-दूसरे पर अबील, गुलाल, हल्दी और इत्र छिड़कते हैं और विभिन्न वाद्यों की ताल पर नाचते हुए अपना मुंह मीठा करते हैं। जैसे ही गोकुलवासी नंदलाल को पालने में झुलाते हैं, व्रजबालाओं द्वारा जन्मोत्सव वधी गान के भजन, स्तोत्र और पठाण गाए जाते हैं। नंदरायजी छड़ी का पूजन करते हैं। जो बालक को आशीर्वाद प्रदान करती है और बुरे तत्वों से सुरक्षा प्रदान करती है। नंदरायजी और यशोदामैया ब्राह्मणों को गाय दान करते हैं। दरिद्रनारायण को भक्तिपूर्ण भोजन परोसा जाता है। 

  
नंदगवासी और गोकुलवासी 

  

नंद घेर आनंद भेहो…जय कनैया लाल की…, 

हाथी-घोड़ा-पालखी जय कनैया लाल की 

  

                    कृष्ण भक्ति का दिव्य वातावरण बनाते हैं। नन्दरायजी और यशोदामैया व्रज की गोपियों के साथ न्युत्या करते हैं। दूध, दही, हल्दी, चंदन प्राप्त कर भावी भक्तों पर पिचकारी छिड़की जाती है और फिर परिक्रमा की जाती है। उस समय ऐसा दिव्य वातावरण निर्मित होता है, जैसे ब्रह्मानंद एकत्र हुए हों। गोकुलवासी चॉकलेट, खिलौने और मुद्राएं फेंककर कृष्ण जन्मोत्सव का आनंद लूटते हैं। इसके बाद गोकुल के चौक-चौकरी में मटकीफोड़(Matkiphod) कार्यक्रम रंगारंग रूप से मनाया जाता है। इस प्रकार नन्द उत्सव संपन्न होता है। 

  
मथुरा(Mathura): मथुरा भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि है। जन्माष्टमी उत्सव के समापन पर पूरा मथुरा नगरी रंगों से नहा उठता है। मथुरा नगरी रंग-बिरंगी रोशनी और फूलों की तोरई से जगमगा उठती है। मथुरा नगरी में हर तरफ कृष्ण लीला के दृश्य दिखाई देते हैं। इस दिन सुबह से ही भगवान की विभिन्न प्रकार से पूजा की जाती है। मध्य रात्रि में भगवान की मूर्ति को पंचामृत और विभिन्न नदियों के जल से स्नान कराया जाता है और भगवान को पारंपरिक वस्त्र पहनाए जाते हैं। ठीक बारह बजे भगवान को कृष्ण जन्मोत्सव की बधाई के साथ पालने में झुलाया जाता है।


                   शंख, घंटियां, कृष्ण और विभिन्न वाद्यों की धुन से पूरी मथुरा नगरी गूंज उठती है। पूजा संपन्न होने के बाद भगवान को छप्पनभोग लगाया जाता है। छप्पनभोग का प्रसाद निरोगी कृष्ण भक्तों को निराहार छोड़ता है। मथुरा में झूलनोत्सव(Jhulnotsav) और घट स्थापना का आयोजन किया जाता है। कृष्ण के जन्म की खुशी में घरों और मंदिरों के आंगन में पालने रखे जाते हैं और उन्हें फूलों से सजाया जाता है। मथुरा नगरी के सभी मंदिरों को अक्षत रंग से कलात्मक ढंग से रंगा जाता है। इस दिन भगवान को भी इसी रंग के वस्त्र पहनाए जाते हैं। भाविक भक्त और मथुरावासी कृष्ण जन्मोत्सव मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। 

  
वृंदावन(Vrindavan): श्रीश्याम-श्यामा की विहारभूमि यानी श्री वृंदावनधाम। वृंदावन में भगवान कृष्ण द्वारा की गई रासलीला और गोपियों के साथ अद्भुत लीलाओं का बड़ा महत्व है। वृंदावन में जगह-जगह रासलीला और कृष्णलीला का आयोजन होता है। वृजवासी कृष्ण के जीवन की विभिन्न घटनाओं का नाट्य रूपांतरण करते हैं। यहां हर बालक-बालिका राधा-कृष्ण का वेश धारण कर रासलीला करते हैं।


                   कदम वृक्ष(Kadam tree) के नीचे प्रिया-प्रीतम को फूलों के हिंडोले पर झुलाया जाता है। भगवान कृष्ण और राधा ने यहां मधुवन आदि स्थानों पर रासोत्सव किया था। कहा जाता है कि आज भी भगवान गोपियों के साथ रास रचाने मधुवन आते हैं। यदि कोई व्यक्ति भूलवश रात्रि में मधुवन में प्रवेश कर जाए तो उसकी मृत्यु हो जाती है या वह पागल हो जाता है। इसलिए लोककथा है कि रात्रि में यह स्थान सुनसान हो जाता है। जन्माष्टमी की सुबह मधुवन में रासलीला का आयोजन होता है। 

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🌻रास-लीला(Ras-Lila):🌻
 

                   रास का अर्थ है ‘सौंदर्य(aesthetics)’ या ‘दैवीय आनंद(Devine pleasure)’ और लीला का अर्थ है ‘जादू’ या ‘खेल’। रास-लीला उनके बचपन की याद में की जाती है। कृष्ण ने छह साल की उम्र में अपना महा रास किया था। जब कृष्ण बांसुरी बजा रहे थे, तब सभी गोपियाँ कृष्ण के पास आती थीं और वे पूरी तरह से दैवीय शक्ति के आगे झुककर नृत्य करती थीं। गोपियों को कृष्ण की शाश्वत भक्त या उनकी आंतरिक आध्यात्मिक शक्ति की अभिव्यक्ति कहा जाता है। इसलिए कुछ क्षेत्रों में कृष्ण के साथ-साथ गोपियों की भी पूजा की जाती है। वृंदावन में राधा सहित कुल 108 गोपियाँ थीं और उनमें से 8 कृष्ण और राधा के सबसे करीब थीं। 

  
                   रास-लीला ने भारतीय शास्त्रीय और लोक-नृत्य(folk-dance) रूपों में एक प्रमुख स्थान ले लिया है। जन्माष्टमी के दौरान, यह अधिकांश मंदिरों और अन्य स्थानों पर किया जाता है। इसे प्रशिक्षित नर्तकियों द्वारा किया जाता है। यह महोत्सव के दिन किया जाता है।

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 💐दही-हांडी(Dahi-handi)💐

                कृष्ण को माखन चोर(Makhan Chor) या नवनीत चोर भी कहा जाता है क्योंकि वह पड़ोसी घरों से दही(curd), छाछ(buttermilk), मक्खन(butter), घी(ghee) और दूध(milk) चुराता था। जब यशोदा कृष्ण की मक्खन और दही चुराने की आदत से तंग आ गईं तो उन्होंने और अन्य गोपियों ने छत से दही, मक्खन और दूध की मटकी लटकाने का फैसला किया। लेकिन हमारे नन्हे कृष्ण इतने शरारती थे कि वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर लटकी हुई दही तक पहुँचने के लिए मानव पिरामिड बनाते थे। फिर वे मटकी को हटाते या तोड़ते और आपस में मक्खन बाँटते थे। 

  
                 भगवान की इन प्यारी शरारतों को याद करने के लिए कृष्ण जन्माष्टमी के दूसरे दिन दही-हांडी का आयोजन किया जाता है। यहाँ दही का मतलब दही और हांडी का मतलब बर्तन है। इसे लगभग 20 से 30 फीट की ऊँचाई पर लटकाया जाता है और बर्तनों में दही, मक्खन, मिठाइयाँ और मेवे, रंगीन पानी, फूल आदि भरे जाते हैं। लेकिन ज़्यादातर समय इसे दूध से बने किसी भी उत्पाद से भरा जाता है। इसमें भाग लेने वाले युवा लड़कों को गोविंदा कहा जाता है। वे मानव पिरामिड बनाते हैं और हांडी तक पहुंचते हैं और उसे तोड़ते हैं। इस श्रेणी में प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य युवाओं में भाईचारा, समन्वय और शक्ति विकसित करना है। 

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