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🌼 भगवान गणेश पाठ 🌼

॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥

🚩भगवान गणेश पाठ 2025 🚩

श्री गणेश अथर्वशीर्ष:
॥ श्री गणेशाय नम:

 
॥ शान्ति पाठ ॥  

ॐ भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा: । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:॥ 

स्थिरै रंगै स्तुष्टुवां सहस्तनुभि: । व्यशेम देवहितं यदायु: ॥

  
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा:। स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:। 

स्वस्ति न स्तार्क्ष्र्यो अरिष्ट नेमि:॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ 

  
ॐ शांति:। शांति:।। शांति:।।। 

  
अथ श्री गणपति अथर्वशीर्ष स्तुति

 
॥ उपनिषत् ॥ 

 

ॐ नमस्ते गणपतये । 
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ॥ 

त्वमेव केवलं कर्त्ताऽसि ।
 
त्वमेव केवलं धर्तासि ॥ 

त्वमेव केवलं हर्ताऽसि ।
 
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ॥

त्वं साक्षादत्मासि नित्यम्। 

 
॥ स्वरूप तत्त्व ॥ 

ऋतं वच्मि ॥ सत्यं वच्मि ॥ 

अव त्वं मां ॥ अव वक्तारं ॥ 

अव श्रोतारं ॥ अवदातारं ॥ 

अव धातारम अवानूचानमवशिष्यं ॥ 

अव पश्चातात् ॥ अवं पुरस्तात् ॥ 

अवोत्तरातात् ॥ अव दक्षिणात्तात् ॥ 

अवचोर्ध्वात्तात् ॥ अवाधरात्तात् ॥

सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात् ॥ 

  
त्वं वाङग्मयचस्त्वं चिन्मय । 

त्वं वाङग्मयचस्त्वं ब्रह्ममय: ॥ 

त्वं सच्चिदानंदा द्वितियोऽसि । 

त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । 

त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥

  
सर्व जगदि‍दं त्वत्तो जायते । 

सर्व जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति । 

सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ॥

सर्व जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥

त्वं भूमिरापोनलोऽनिलो नभ: ॥

त्वं चत्वारिवाक्पदानी ॥ 

  
त्वं गुणयत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:। 

त्वं देहत्रयातीत: त्वं कालत्रयातीत:। 

त्वं मूलाधार स्थितोऽसि नित्यं । 

त्वं शक्ति त्रयात्मक: ॥

त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम् । 

त्वं शक्तित्रयात्मक:॥

त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम् । 

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं । 

वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोम् ॥

 
॥ गणेश मंत्र ॥  

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं ॥ 

अनुस्वार: परतर:॥ अर्धेन्दुलसितं ॥ 

तारेण ऋद्धं ॥ एतत्तव मनुस्वरूपं ॥ 

गकार: पूर्व रूपं अकारो मध्यरूपं । 

अनुस्वारश्चान्त्य रूपं ॥ बिन्दुरूत्तर रूपं ॥ 

नाद: संधानं ॥ संहिता संधि: सैषा गणेश विद्या ॥

गणक ऋषि: निचृद्रायत्रीछंद: ॥ ग‍णपति देवता ॥

ॐ गं गणपतये नम: ॥ 

  
॥ गणेश गायत्री ॥ 

एकदंताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नोदंती प्रचोद्यात ॥ 

 
॥ गणेश रूप ॥ 

एकदंत चतुर्हस्तं पारामंकुशधारिणम् ॥

रदं च वरदं च हस्तै र्विभ्राणं मूषक ध्वजम् ॥

रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ॥

रक्त गंधाऽनुलिप्तागं रक्तपुष्पै सुपूजितम् ॥ 

  

भक्तानुकंपिन देवं जगत्कारणम्च्युतम् ॥ 

आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृतै: पुरुषात्परम ॥

एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनांवर: ॥

 
॥ अष्ट नाम गणपति ॥
  
नमो व्रातपतये नमो गणपतये ॥ नम: प्रथमपत्तये ॥

नमस्तेऽस्तु लंबोदारायैकदंताय विघ्ननाशिने शिव सुताय । 

श्री वरदमूर्तये नमोनम: ॥

  
॥ फलश्रुति ॥ 

 
एतदथर्वशीर्ष योऽधीते ॥ स: ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ 

स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते स सर्वत: सुख मेधते ॥

  
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ॥ 

प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ॥

सायं प्रात: प्रयुंजानो पापोद्‍भवति । 

सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ॥ 

धर्मार्थ काममोक्षं च विदंति ॥ 

  
इदमथर्वशीर्षम शिष्यायन देयम ॥

यो यदि मोहाददास्यति स पापीयान भवति ॥

सहस्त्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत ॥ 

  
अनेन गणपतिमभिषिं‍चति स वाग्मी भ‍वति ॥ 

चतुर्थत्यां मनश्रन्न जपति स विद्यावान् भवति ॥

इत्यर्थर्वण वाक्यं ॥ ब्रह्माद्यारवरणं विद्यात् न विभेती कदाचनेति ॥ 

  
यो दूर्वां कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति ॥

यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति ॥ स: मेधावान भवति ॥

यो मोदक सहस्त्रैण यजति । 

स वांञ्छित फलम् वाप्नोति ॥

य: साज्य समिभ्दर्भयजति, स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥

  
अष्टो ब्राह्मणानां सम्यग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति ॥ 

सूर्य गृहे महानद्यां प्रतिभासंनिधौ वा जपत्वा सिद्ध मंत्रोन् भवति ॥

  
महाविघ्नात्प्रमुच्यते ॥ महादोषात्प्रमुच्यते ॥  महापापात् प्रमुच्यते ।

स सर्व विद्भवति स सर्वविद्भवति। य एवं वेद इत्युपनिषद ॥ 

  
ॐ भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा:। 

भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा: ॥ 

स्थिरै रंगै स्तुष्टुवां सहस्तनुभि:। 

व्यशेम देवहितं यदायु:॥

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा:। 

स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:। 

स्वस्ति न स्तार्क्ष्र्यो अरिष्ट नेमि: ॥ 

स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ 

ॐ शांति:॥ शांति:॥ शांति:॥

॥ इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं समाप्तम् ॥ 

 

 

🙏 गणेश जी की आरती 🙏  

  
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। 

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ 

  
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी । 

माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥ 

  
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । 

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ 

  
पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा । 

लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा ॥ 

  
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा। 

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ 

  
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया। 

बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥ 

  
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । 

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ 

  
सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा । 

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ 

  
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । 

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ 

  
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी । 

कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी ॥ 

  
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । 

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥

*** 

 
🙏 गणेश चालीसा🙏 

 
॥ दोहा ॥ 

जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल । 

विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल ॥ 

  
॥ चौपाई ॥ 

जय जय जय गणपति गणराजू । 

मंगल भरण करण शुभः काजू ॥ 

  
जै गजबदन सदन सुखदाता । 

विश्व विनायका बुद्धि विधाता ॥ 

  
वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना । 

तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥ 

  
राजत मणि मुक्तन उर माला । 

स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥ 

  
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । 

मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥ 

  
सुन्दर पीताम्बर तन साजित । 

चरण पादुका मुनि मन राजित ॥ 

  
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता । 

गौरी लालन विश्व-विख्याता ॥ 

  
ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे । 

मुषक वाहन सोहत द्वारे ॥ 

 
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी । 

अति शुची पावन मंगलकारी ॥ 

  
एक समय गिरिराज कुमारी । 

पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ॥ 10 ॥ 

  
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । 

तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा ॥ 

  
अतिथि जानी के गौरी सुखारी । 

बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥ 

  
अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा । 

मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥ 

  
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला । 

बिना गर्भ धारण यहि काला ॥ 

  
गणनायक गुण ज्ञान निधाना । 

पूजित प्रथम रूप भगवाना ॥ 

  
अस कही अन्तर्धान रूप हवै । 

पालना पर बालक स्वरूप हवै ॥ 

  

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना । 

लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना ॥ 

  
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं । 

नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ॥ 

  
शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं । 

सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ॥ 

  
लखि अति आनन्द मंगल साजा । 

देखन भी आये शनि राजा ॥ 20 ॥ 

  
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । 

बालक, देखन चाहत नाहीं ॥ 

  
गिरिजा कछु मन भेद बढायो । 

उत्सव मोर, न शनि तुही भायो ॥ 

  
कहत लगे शनि, मन सकुचाई । 

का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ॥ 

  
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ । 

शनि सों बालक देखन कहयऊ ॥ 

  
पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा । 

बालक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥ 

  
गिरिजा गिरी विकल हवै धरणी । 

सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी ॥ 

  
हाहाकार मच्यौ कैलाशा । 

शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा ॥ 

  
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो । 

काटी चक्र सो गज सिर लाये ॥ 

  
बालक के धड़ ऊपर धारयो । 

प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥ 

  
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । 

प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे ॥ 30 ॥ 

  
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा । 

पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥ 

  
चले षडानन, भरमि भुलाई । 

रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई ॥ 

  
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें । 

तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥ 

  
धनि गणेश कही शिव हिये हरषे । 

नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे ॥ 

  
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई । 

शेष सहसमुख सके न गाई ॥ 

  
मैं मतिहीन मलीन दुखारी । 

करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी ॥ 

  
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा । 

जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा ॥ 

  
अब प्रभु दया दीना पर कीजै । 

अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै ॥ 38 ॥ 

  
॥ दोहा ॥ 

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान । 

नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान ॥ 

  
सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश । 

पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश ॥ 

***

 
🙏 संकटनाशन गणेश स्तोत्र 🙏

  
॥ श्री गणेशायनमः ॥ 

  
नारद उवाच – 

प्रणम्यं शिरसा देव गौरीपुत्रं विनायकम । 

भक्तावासं: स्मरैनित्यंमायु:कामार्थसिद्धये ॥ 1॥ 

  
प्रथमं वक्रतुंडंच एकदंतं द्वितीयकम । 

तृतीयं कृष्णं पिङा्क्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम ॥ 2॥ 

  
लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च । 

सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्ण तथाष्टकम् ॥ 3॥ 

  
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम । 

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम ॥ 4॥ 

  
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्य य: पठेन्नर: । 

न च विघ्नभयं तस्य सर्वासिद्धिकरं प्रभो ॥ 5॥ 

  
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् । 

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ 6॥ 

  
जपेद्वगणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलं लभेत् । 

संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ॥ 7 ॥ 

  
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वां य: समर्पयेत । 

तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ॥ 8॥ 

  
॥ इति श्रीनारदपुराणे संकष्टनाशनं गणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम्‌ ॥