पार्श्व एकादशी(Parsva Ekadashi) पूरे भारत में अपार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इसे देश के विभिन्न क्षेत्रों में ‘पद्म एकादशी(Padma Ekadashi)’, ‘वामन एकादशी(Vamana Ekadashi)’, ‘जयंती एकादशी(Jayanti Ekadashi)’, ‘जलझिलिनी एकादशी(‘Jaljhilini Ekadashi)’ और ‘परिवर्तिनी एकादशी(Parivartini Ekadashi)’ जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इस अवधि के दौरान भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और वे अपनी शयन मुद्रा को बाईं ओर से दाईं ओर कर लेते हैं, और इसलिए इसका नाम ‘पार्श्व परिवर्तिनी एकादशी’ पड़ा। कुछ जगहों पर, पार्श्व एकादशी के दिन भगवान विष्णु के अवतार भगवान वामन की पूजा की जाती है। इस एकादशी का पवित्र व्रत करने से व्यक्ति को श्री हरि विष्णु का आशीर्वाद मिलता है, जो इस ब्रह्मांड के पालनहार हैं।
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पार्श्व एकादशी – बुधवार, 3 सितंबर 2025 को
पारण का समय – 4 सितंबर, 02:05 बजे से शाम 04:35 बजे तक
पारण दिवस हरि वासर समाप्ति क्षण – सुबह 10:18 बजे
एकादशी तिथि आरंभ – 03 सितंबर 2025 को प्रातः 03:53 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त – 04 सितंबर 2025 को प्रातः 04:21 बजे
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पार्श्व एकादशी(Parsva Ekadashi) प्राचीन काल से मनाई जाती रही है। ऐसा माना जाता है कि पार्श्व एकादशी व्रत व्रत करने वाले को सुख, धन और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करता है। इसके अलावा यह अतीत के पापों से छुटकारा दिलाता है और व्यक्ति को जन्म और मृत्यु के निरंतर चक्र से भी मुक्त करता है। पार्श्व एकादशी व्रत का पालन करने से, भक्तों को आध्यात्मिक लाभ होता है और इससे उन्हें अपनी इच्छा शक्ति को मजबूत करने में भी मदद मिलती है। पार्श्व एकादशी को अन्य एकादशियों से श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह ‘चतुर्मास(Chaturmas)‘ अवधि के दौरान आती है और इस दौरान संचित ‘पुण्य‘ या गुणों का मूल्य सामान्य महीनों की तुलना में अधिक होता है। पार्श्व एकादशी का महत्व ‘ब्रह्म विवर्त पुराण(Brahma Vivarta Purana)‘ में भगवान कृष्ण(Lord Krishna) और राजा युधिष्ठिर(King Yudhisthira) के बीच बातचीत के रूप में भी बताया गया है।
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पवित्र ग्रंथों के अनुसार, पार्श्व परिवर्तिनी एकादशी(Parsva Parivarthini Ekadasi) व्रत रखने से निम्नलिखित आशीर्वाद प्राप्त होते हैं:
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पार्श्व एकादशी पर पूजा विधि के अलावा कई अन्य अनुष्ठान भी किए जाते हैं:
दान(Charity): जरूरतमंदों को दान देना इस दिन का एक अनिवार्य पहलू है। गरीबों और ज़रूरतमंदों को भोजन( food), वस्त्र(clothing) और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान किया जाता है।
ध्यान(Meditation): भक्त अपने आध्यात्मिक जुड़ाव और आत्म-जागरूकता को बढ़ाने के लिए ध्यान और आत्मनिरीक्षण करते हैं।
धर्मग्रंथों का पाठ(Reading Scriptures): भगवद् गीता या विष्णु सहस्रनाम( Vishnu Sahasranama) जैसे पवित्र ग्रंथों का पाठ करना या खड़े होकर सुनना अत्यंत पवित्र माना जाता है। ये पाठ व्यक्ति की समझ और भक्ति को गहरा करने में मदद करते हैं।
मौन धारण(Observing Silence): कुछ भक्त अपनी आध्यात्मिक साधना पर ध्यान केंद्रित करने और ध्यान भटकाने से बचने के लिए दिन के कुछ समय के लिए मौन धारण करते हैं।
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क्या करें(Do’s):
क्या न करें(Don’ts):
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ॐ श्री कृष्णाय शरणं मम ।
Om Shri Krishnay Sharanam Mam.
ॐ विष्णवे नम:।
Om Vishnave Namah.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम-राम हरे हरे।
Hare Krishna Hare Krishna, Krishna-Krishna Hare Hare.
Hare Ram Hare Ram, Ram-Ram Hare Hare.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
Om namo bhagvate vasudevay.
ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।
Om Narayanaya Vidmahe. Vasudevaya dhimahi. Tanno Vishnu Prachodayat.
ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि।
Om Namo Narayan. Shri Man Narayan Narayan Hari Hari.
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।
Shri Krishna Govind Hare Murare. he Nath Narayan Vasudevay.
ॐ क्रीं कृष्णाय नमः।
Om Krim Krishnay Namah.
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पार्श्व एकादशी केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है; यह आध्यात्मिक महत्व और परिवर्तनकारी शक्ति से परिपूर्ण दिन है। इस पवित्र दिन व्रत रखने, पूजा करने और दान-पुण्य करने से आंतरिक शांति और दिव्य आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। पार्श्व एकादशी पर किए जाने वाले अनुष्ठान, व्रत और दान हिंदू धर्म से गहराई से जुड़े हुए हैं। यह पवित्रता, निस्वार्थता और भक्तिमय जीवन को बढ़ावा देता है।
जब भक्त प्रार्थना(prayer), व्रत(fasting) और दान(charity) के माध्यम से भगवान विष्णु से जुड़ते हैं, तो वे आध्यात्मिक विकास और परम मुक्ति की ओर अपनी यात्रा शुरू करते हैं। पार्श्व एकादशी को निष्ठापूर्वक मनाने से अपार आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं, आत्मा शुद्ध होती है और व्यक्ति का जीवन दिव्य गुणों से परिपूर्ण होता है।
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